भोजपुर के धुसरीया गांव में कद्दू की खेती बनी किसानों की तरक्की का जरिया, लोरिक पासवान बने मिसाल

Pumpkin farming has become a means of progress for farmers in Bhojpur's Dhusriya village, Lorik Paswan becomes an example

बड़हरा (भोजपुर): बिहार के भोजपुर जिले के बड़हरा प्रखंड स्थित धुसरीया गांव के किसानों ने कद्दू (लौकी) की खेती से न सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारा है, बल्कि पारंपरिक खेती में नवाचार लाकर दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन गए हैं। खासकर किसान लोरिक पासवान ने लौकी की खेती को अपनाकर कम समय में दोगुनी कमाई की मिसाल पेश की है।

लोरिक पासवान ने बताया कि उन्होंने इस साल चार बीघा जमीन पर लौकी की खेती की, जिसमें कुल ₹80,000 का खर्च आया। शादी-विवाह के सीजन में लौकी की बढ़ती मांग के कारण उन्हें चार लाख रुपये तक की आमदनी हुई। लोरिक कहते हैं, “धान-गेहूं से केवल जीवन चलता है, लेकिन सब्जी की खेती से कमाई भी होती है।”

उनकी सफलता को देखकर अब धुसरीया गांव लौकी उत्पादन का केंद्र बनता जा रहा है। गांव के कई अन्य किसानों ने भी लौकी की खेती शुरू कर दी है। प्रत्येक दो दिन में 600-800 किलो लौकी उनके खेत से निकलती है, जिसे आरा, छपरा और कायमनगर के बाजारों में बेचा जाता है। कई व्यापारी सीधे खेत पर आकर खरीदारी करते हैं, जिससे किसानों को बाजार ढूंढने की मशक्कत नहीं करनी पड़ती।

लोरिक सलाह देते हैं कि छोटे पैमाने पर नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर खेती करें, ताकि लागत के मुकाबले अच्छा लाभ मिल सके और मांग की समस्या न आए।

क्यों खास है लौकी की खेती:

  • कम समय में अधिक मुनाफा: केवल चार महीने में फसल तैयार
  • कम सिंचाई की जरूरत: गर्मी में भी कम पानी में अच्छी पैदावार
  • बाजार में भारी मांग: विशेषकर शादी-विवाह के सीजन में
  • बिहार की मिट्टी और जलवायु अनुकूल: उच्च उत्पादन की संभावना

लोरिक पासवान और धुसरीया गांव की यह कहानी यह साबित करती है कि सही सोच, मेहनत और नवाचार से गांव के किसान भी कृषि में क्रांति ला सकते हैं।

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